भारतीय संस्कृति में राजस्थानी संस्कृति की अलग पहचान Rajasthani culture has different identity in Indian culture

भारतीय संस्कृति में राजस्थानी संस्कृति  की अलग पहचान 
Rajasthani culture has different identity in Indian culture



राजस्थानी संस्कृति (Culture of rajasthan) भारत देश एक बहुसांस्कृतिक देश है! यहाँ पर अनेक प्रकार की संस्कृतिया पायी जाती है! जिनमें से राजस्थान की संस्कृति बहुत प्रसिद्ध है!यह संस्कृति राजाओं महाराजाओं द्वारा बनाई गयी थी यहाँ के मंदिरों,महल तथा किलों  की भव्यता,वास्तुकला और सुंद सहन,शाही खान पान,पहरावा,रिति रिवाज,नृत्य कला,लोकगीत,राजस्थान के राजा महाराजाओं जैसे सम्राटरता यहाँ की संस्कृति को परिभाषित करती है,यहाँ के लोगों की अपनी अलग पहचान है! यहाँ के लोगों का रहन पृथ्वी राज चौहान,महाराणा प्रताप,महा सिंह, ने सारे विश्व में अपनी शूरवीरता और प्रबलता का लोहा मनवाया!यहाँ के समाज में राजा महाराजाओं के वीरता की झलक देखने को मिलती है यह संस्कृति शाही घरानो से प्रभावित है! इस में ऊंट की सवारी,नृत्य कला,पहरावे,आभूषणों तथा मिलनसार सवभाव और मेहमान नवाजी के लिए जाना जाता हैराजस्थान के त्यौहार में दिलचस्प अनुष्ठान,जातीयता,परंपरा,त्योहार और उत्सव शामिल हैं



राजस्थान की संस्कृति के बारे में पढ़ें जो इसे भारत में सबसे अधिक पर्यटक उन्मुख राज्यों में से एक बनाती है:
  • अतिथि देवो भवः 
  • राजस्थानी रहन सहन और पारंपरिक पोशाक  
  • राजस्थानी भाषा और स्थानीय बोली 
  • खाद्य पदार्थ एव  पकवान 
  • राजस्थानी लोकनृत्य एवं लोकगीत 
  • प्रसिद्ध मेले और त्यौहार 
अतिथि देवो भवः(Atithi Devo Bhavah) अत्तिथि देवो भव 'का अर्थ है अपने मेहमानों के साथ वैसा ही व्यवहार करना, जैसा  की आप ईश्वर से करते हैं। यह सिद्धांत राजस्थानी संस्कृति का एक हिस्सा है। वे अपने मेहमानों के साथ अच्छा व्यवहार करते हैं और उन्हें फिर से आने का मौका देते हैं। राजस्थान के अधिकांश लोग पर्यटन से संबंधित नौकरियों में शामिल हैं और इसलिए इस सिद्धांत को बहुत गंभीरता से लेते हैं क्योंकि वे पर्यटकों के कारण अपना राजस्व कमाते हैं और उनकी सेवा करने का संकल्प लेते हैं। एक लोकप्रिय लोक गीत 'पधारो म्हारे देश' का साहित्यिक अर्थ है 'मेरे देश में आपका स्वागत है'। राजस्थान आतिथ्य सभी जगह प्रसिद्ध है



राजस्थानी रहन सहन और पारंपरिक पोशाक (Rajasthani living and traditional dress)भारत की अन्य संस्कृतियों में से राजस्थानी संस्कृति के लोगों की पोशाक सब से अलग होती हैं राजस्थानी कपडे बहुत रंग बिरंगे होते हैं यहाँ की महिलाएं के कपडे पारम्परिक रूप से सुखद तथा आरामदायक होते हैं ! महिलाएं घागरा चोली और सम्मान के रूप में सिर को ढकने के लिए ओढ़नी का प्रयोग करती हैं,इनके कपड़ों का डिज़ाइन या तो कशीदाकारी या तो बिंदीदार होता है!ओढ़निओं पर गोटा पट्टी की सिलाई होती है,कईं स्थानों पर राजस्थानी महिलाएं साड़ी पहनना पसंद करती हैं! इन साड़ियों को बनाने के लिए रेशम और कपास का प्रयोग किया जाता है!



राजस्थानी पुरुष  धोती कुर्ता पजामा पहनते है और सिर पर रंग बिरंगी पगड़ियां पहनते हैं ये उनके पहनावे का हिस्सा होती है पगड़ी राजस्थानी पुरषों के सिर का ताज होती है! यहाँ के लोग सिर से पाँव तक पगड़ी ,रंग बिरंगे रेशमी कपडे,गहनों ,और जूतें  तक राजस्थानी रंग में रंगे होते हैं,यह पहरावा राजस्थानी सामाजिक स्तिथि को दर्शाता है! यहाँ हर 2 से 4 किलोमीटर पर पगड़ी बांधने का तरीका बदल जाता है! राजस्थान में रंग बिरंगी जूतियां अति प्रसिद्ध है ये भेड़,बकरी,ऊठ की खाल से बनायीं जाती हैं जूतियों के ऊपर जरी से कढ़ाई करके इनके ऊपर चिपकाया जाता है जिससे इसकी सुंदरता और बढ़ जाती है ये जूतियां जयपुर ,रामजीपुरा,जोधपुर ,तथा जैसलमेर से सारे विश्व में बेचीं जाती हैं!आभूषणों की बात करें तो यहाँ के आभूषण विश्व प्रसिद्ध है महिलाएं हाथों पाओं में भारी-भारी चांदी के कड़े पहनती हैं,महिलाएं अपनी मांग में बोरला नाम का मांग टीका लगाती हैं जो लट्टू जैसा होता है इसके इलावा कमरबंद,बाजूबंद सीप तथा लाख के कंगना को पहनना पसंद करती है!

पारंपरिक खाद्य पदार्थ एव  पकवान (Traditional foods and dishes)


राजस्थान का खान पान साधारण होने के साथ काफी दिलचस्प होता है  यहाँ पर दाल बाटी,चूरमा,बाजरे की रोटी,कांज्या,सिरावण,पंचकूटा,राब राबड़ी,सोगरा,टिक्कड़,खट्टा कड़ी,धानी,भूंगड़ा,सत्तु आदि होता है! इसके इलावा  यहाँ का आमिष भोजन (अर्थात मांसाहारी भोजन) यहाँ पर मोठ या चने को पानी में उबाल कर नमक मिर्च व मसाले मिलकर तैयार किया जाता है इसे बरियाँ कहते हैं यहाँ मीठी और मसालेदार। मसालेदार कचौरी को प्याज़ या प्याज की कचौरी कहा जाता है, और मीठी कचौरी को मावा कचौरी कहा जाता है। ये दोनों कचौड़ी राजस्थान के किसी भी फूड स्टॉल में आसानी से उपलब्ध हैं। राजस्थान के अधिकांश रेस्तरां में उपलब्ध मेवाड़ से उत्पन्न घेवर और घिरिया कुछ मनोरम मीठे व्यंजन हैं। 

राजस्थानी लोकनृत्य एव लोकगीत (Rajasthani folk dance and folk songs)





राजस्थानी संस्कृति में लोकनृत्य और लोकगीतों को बहुत मान्यता  दी जाती है यहाँ के संगीत कलाकार द्वारा कई पारंपरिक वाद्ययंत्रों का उपयोग किया जाता है जिनमें सारंगी, कमायच, ढोल, शन्हाई और शामिल हैं। लोक गीत आमतौर पर शादियों या जन्म जैसे कुछ उद्देश्यों के लिए होते थे या बहादुरी की कहानी या रोमांटिक कहानी बताने के लिए पारित किए जाते थे। वे आमतौर पर गाथागीत के रूप में होते थे। नृत्य भी विविध है। विभिन्न जनजातियों के बीच नृत्य अलग-अलग था। यह मुख्य रूप से लोगों और राजा के मनोरंजन के लिए था। कुछ नृत्यों में चंग, घूमर, भोपा, तेजली और काठीपुली शामिल हैं। घूमर नृत्य, जो यू में उत्पन्न हुआ,बहुत प्रसिद्ध है इसे करना काफी कठिन हैं सिर्फ राजस्थानी महिलायें ही इसे अच्छे से निभा सकती है इसके इलावा बंजारों द्वारा किया जानें वाला कालबेलिया नृत्य भी बहुत प्रसिद्ध माना जाता है इसमें उंगलिओं पर थाल घुमाना,किलों पर नाचना,आँख से सुई उठाना,करतब शामिल होते हैं यह लोग घुमंत जीवन व्यतीत करते है यह साँप पकड़कर,विष निकल कर, सर्प दंश का उपचार करके पारम्परिक व्यवसाय करते हैं राजस्थान के पाली जिले में इनकी सर्वाधिक आबादी पाई जाती है!

प्रसिद्ध मेलें और त्यौहार (Famous Fairs and Festivals) यूँ  तो भारतीय संस्कृति में अनेको त्योहार मनाये जाते हैं पर इन त्योहारों और मेलों को देश के सभी राज्यों में अलग-अलग ढंग से मनाया जाता है राजस्थान में भी मेलों तथा त्योहारों को राजस्थानी संस्कृति के अनुसार ही मनाया जाता है,यहाँ का पुष्कर मेला,ऊँठ मेला,डेज़र्ट महोत्सव,मेले प्राचीन समय से लगाए जा रहे हैं इन मेलों में  ऊँट,हाथ से बने ऊँठ की सजावट के सामान मिलते हैं आप यहाँ पर आकर राजस्थान के पकवानों का मज़ा भी ले सकते हैं राजस्थानी त्योहारों में भिनाय की होली,महावीर जी की लठमार होली,बैशाख में तीज का त्यौहार जो बैशाख शुक्ल तृत्य को मनाया जाता है!निर्जला एकादशी,हरियाली अमावस्या,नाग पंचमी,गोगा नवमी,तुलसी एकादशी,दशहरा,दीपावली,आदि त्यौहार प्रसिद्ध हैं!

पुष्कर मेला (Pushkar Fair)


ये मेला अजमेर शरीफ दरगाह से १५ किलोमीटर की दूरी पर स्तिथ पुष्कर नमक स्थान पर लगता है यह मेला कार्तिक माह के अंतिम दिनों में लगता है ये मेला ९ दिनों तक चलता है,यह मेला ब्रह्मा जी मंदिर के लिए बहुत प्रसिद्ध है लोग यहाँ आकर झील में स्नान करते है और ब्रम्हा जी से मनोकामना मांगते हैं!इस मेले में लोग ऊंठ खरीदने तथा बेचने आते हैं,यहाँ गीर नसल,मेवाती,नागोरी,जैसे बढ़िया नस्ल के ऊँटो के अलावा घोड़े बैल आदि खरीदते हैं इस मेले में लोकनृत्यों की झलक भी देखने को मिलती है,घूमर ,गेर,बेलिया आदि का प्रदर्शन करते हैं आप मेले में विभिन व्यंजनों का भी लुफत उठा सकते हैं 

ऊँठ मेला यह मेला (Camel Fair This Fair)


राजस्थान में ऊंट आमतौर पर पाए जाते हैं। ऊंट रेगिस्तानी जानवर हैं जो अपनी जीव विज्ञान के कारण पानी की कमी, अत्यधिक हवाओं, गर्मी और ठंड की स्थिति से बचे रहते हैं। राजस्थान के अधिकांश शिविरों में ऊंट की सवारी शामिल होगी, और आपको अनुभव होगा कि ऊँट अपने लंबे पैरों के कारण रेगिस्तानों में कितनी अच्छी तरह से यात्रा कर सकते हैं। ऊंट मेले हर साल बीकानेर, पुष्कर और अन्य क्षेत्रों में लगते हैं। यह एक त्यौहार या उत्सव है जो रेगिस्तान के जहाज और उनके मालिकों को समर्पित है। वहाँ विभिन्न घटनाओं और प्रतियोगिताओं ओ किया जाता है यह मेला ऊँटो के सम्मान में लगाया जाता हैलोग अपने ऊंटों को किसी दुल्हन की तरह सजा कर मैदान में पेश करते हैं,यह मेला जनवरी माह में आयोजित है इस दौरान यहाँ काफी ठण्ड होती है यहाँ ऊँट की दौड़ करवाई जाती है और प्रतियोगिता में जितने वाले को इनाम दिया जाता है मेले अंत में आतिशबाजी के साथ आसमान रोशन कर दिया जाता है!

राजस्थान की संस्कृति संसार में एक नया रंग मंच तैयार करती है,जो व्यक्ति यहाँ की धरती से जुड़ा है वो इसे कभी नहीं भूल सकता,इतना मान सम्मान,शायद ही कहीं और मिल पाए,क्योंकि राजस्थान के अधिकांश लोग पर्यटन से संबंधित नौकरियों में शामिल हैं और इसलिए इस सिद्धांत को बहुत गंभीरता से लेते हैं क्योंकि वे पर्यटकों के कारण अपना राजस्व कमाते हैं और उनकी सेवा करने का संकल्प लेते हैं। एक लोकप्रिय लोक गीत 'पधारो म्हारे देश' का साहित्यिक अर्थ है 'मेरे देश में आपका स्वागत है'। राजस्थान आतिथ्य पूरे विश्व में प्रसिद्ध है।




















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